नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने पद्मजा कुमारी परमार की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अपने दिवंगत पिता, अरविंद सिंह मेवाड़ की संपत्ति के लिए ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ (प्रशासन पत्र) की मांग की थी। पद्मजा ने इस आधार पर मांग उठाई थी कि उनके पिता की मृत्यु बिना किसी वसीयत के हुई थी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने 17 मार्च को सुनाए फैसले में कहा कि जब तक भाई द्वारा पेश किए गए वसीयतनामे से संबंधित दावा कोर्ट में लंबित है, तब तक ‘बिना वसीयत’ होने के आधार पर कोई भी कानूनी कार्रवाई (cause of action) आगे नहीं बढ़ाई जा सकती है। पद्मजा को अपने भाई के केस के जवाब के तौर पर, संदिग्ध परिस्थितियों से जुड़ी अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति दी गई है। अब इस मामले में आगे की कार्यवाही 4 मई, 2026 को होगी। इस फैसले के साथ ही, मेवाड़ परिवार के भाई-बहनों द्वारा शुरू की गई दो अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियों के बीच चल रहे प्रक्रियात्मक टकराव का भी निपटारा हो गया।
*अरविंद सिंह मेवाड़ से जुड़ी है याचिका*
यह कानूनी लड़ाई स्वर्गीय अरविंद सिंह मेवाड़ द्वारा छोड़ी गई विशाल संपत्ति से जुड़ी है। मेवाड़ का निधन 16 मार्च, 2025 को उदयपुर में हुआ था। पद्मजा कुमारी परमार ने शुरू में कोर्ट में यह दावा करते हुए याचिका दायर की थी कि उनके पिता की मृत्यु बिना किसी वैध वसीयत के हुई है। इसके आधार पर, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत, उनके चार ‘प्रथम श्रेणी’ के कानूनी वारिसों—उनकी विधवा, दो बेटियों और एक बेटे—को संपत्ति में बराबर का, यानी एक-चौथाई हिस्सा मिलना चाहिए। हालांकि, उनके भाई, लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने 7 फरवरी, 2025 की तारीख वाला एक पंजीकृत वसीयतनामा पेश किया। इस वसीयतनामे में कथित तौर पर उन्हें ही पूरी संपत्ति का एकमात्र वारिस और उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। पद्मजा ने इस वसीयत की प्रामाणिकता को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि जिस समय यह वसीयत बनाई गई थी, उस समय उनके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ थे।
*क्या है आरोप?*
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके पिता गंभीर शारीरिक और मानसिक बीमारियों से पीड़ित थे, जिनमें कानूनी रूप से दृष्टिहीनता, डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) और पार्किंसंस रोग शामिल थे। उन्होंने आगे दावा किया कि यह दस्तावेज़ उनके पिता पर अनुचित दबाव डालकर हासिल किया गया था, जबकि उस दौरान उनके पिता को लगातार निगरानी में रखा गया था।
इसके विपरीत, लक्ष्यराज ने यह तर्क दिया कि वसीयत को पूरी तरह से विचार-विमर्श करने के बाद ही निष्पादित किया गया था, और एक पारिवारिक डॉक्टर ने यह प्रमाणित किया था कि स्वर्गीय मेवाड़ उस समय पूरी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ थे। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि उनकी बहनों ने भविष्य के विवादों से बचने के लिए पहले ही अपने हिस्से के शेयर वापस अपने पिता को ट्रांसफर कर दिए थे और कंपनियों के निदेशक पदों से भी इस्तीफा दे दिया था।
*कोर्ट ने क्या कहा?*
कोर्ट ने कहा कि ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम’ के तहत, एक बार जब किसी वसीयत के साथ अटैच ‘लेटर्स ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन’ के लिए याचिका दायर कर दी जाती है, तो उस वसीयत की वैधता से जुड़े विवाद का निपटारा केवल उसी खास कानूनी कार्यवाही के भीतर ही किया जाना चाहिए। फैसले में इस बात पर खास ज़ोर दिया गया कि जब कोई वसीयत सामने आ चुकी हो और उसे सक्रिय रूप से वैध साबित करने की कोशिश हो रही हो, तो ‘बिना वसीयत’ होने की धारणा पर आधारित कोई भी समानांतर कानूनी कार्यवाही जारी नहीं रह सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।







