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गुमनाम नायकों का गौरव; सामने आई पद्म पुरस्कार 2026 हासिल करने वालों की लिस्ट

स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का काम किया, तो किसी ने शिक्षा, आजीविका, स्वच्छता, सतत विकास और समाज के कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण के लिए निरंतर प्रयास किए.

नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस से पहले रविवार को पद्म पुरस्कारों की सूची सामने आई है. सूत्रों के मुताबिक इस लिस्ट में कैलाशचंद, ब्रज लाल भट्ट, डॉ. श्याम सुंदर समेत कई नाम शामिल हैं. हालांकि, सरकार की ओर से इसे लेकर अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. आम नागरिकों द्वारा दिए गए असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है. इन सभी व्यक्तियों ने अपने जीवन में भारी व्यक्तिगत कठिनाइयों, संघर्षों और त्रासदियों का सामना किया, लेकिन इसके बावजूद वे अपने-अपने क्षेत्र में न केवल आगे बढ़े, बल्कि समाज की सेवा को ही अपना उद्देश्य बना लिया. इनमें हाशिए पर रहने वाले पिछड़े वर्ग, दलित समुदाय, आदिम जनजातियों से जुड़े लोग और दुर्गम व दूरदराज इलाकों से आने वाले नागरिक शामिल हैं. ये वे लोग हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन दिव्यांगजन, महिलाओं, बच्चों, दलितों और आदिवासियों की सेवा में समर्पित कर दिया.
किसी ने स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का काम किया, तो किसी ने शिक्षा, आजीविका, स्वच्छता, सतत विकास और समाज के कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण के लिए निरंतर प्रयास किए. पद्म पुरस्कार पाने वालों में स्थानीय स्वास्थ्य चुनौतियों जैसे हीमोफीलिया पर काम करने वाले डॉक्टरों से लेकर भारत का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक स्थापित करने वाले नवजात शिशु विशेषज्ञ तक शामिल हैं. वहीं, कुछ लोगों ने भारत की स्वदेशी विरासत को संरक्षित करने और सीमावर्ती राज्यों में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का कार्य किया. कई पुरस्कार विजेताओं ने जनजातीय भाषाओं, पारंपरिक मार्शल आर्ट, विलुप्त होती कलाओं और हथकरघा परंपराओं को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाई, तो कुछ ने देश की पारिस्थितिक संपदा की रक्षा और स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया. इस वर्ष पद्म पुरस्कारों की सूची में कई गुमनाम नायकों को सम्मानित किया जाएगा. इन लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने अदम्य साहस, समर्पण और समाजसेवा से देश को गौरवान्वित किया है.
 *बुदरी ठाडी, अंके गौड़ा, भगवान दास… मिलिए उन 45 ‘कर्मयोग‍ियों’ से, ज‍िन्‍हें सरकार ने द‍िया पद्म सम्‍मान*
ये किसी बड़े शहर की चकाचौंध में नहीं रहते, न ही सोशल मीडिया पर इनके लाखों फॉलोअर्स हैं. ये वो ‘कर्मयोगी’ हैं जिन्होंने खामोशी से अपना पूरा जीवन समाज, संस्कृति और मानवता की सेवा में लगा दिया. कोई बंजर जमीन पर जंगल उगा रहा है, तो कोई लुप्त होती आदिवासी कला को अपनी सांसों में जिंदा रखे हुए है. भारत सरकार ने इस साल ऐसे ही 45 ‘गुमनाम नायकों’ को पद्म पुरस्कारों से नवाजा है. ये सम्मान सिर्फ इन व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, त्याग और उस ‘तपस्या’ का है जो उन्होंने दशकों तक बिना किसी उम्मीद के की.
*1. अंके गौड़ा, कर्नाटक*
एक बस कंडक्टर से ‘ज्ञान रक्षक’ बने कर्नाटक के अंके गौड़ा ने मांड्या में ‘पुस्तक मने’ (किताबों का घर) स्थापित किया है. उनके निजी पुस्तकालय में 10 लाख से अधिक पुस्तकें हैं, जिनमें 22 भारतीय और विदेशी भाषाएं शामिल हैं. उन्होंने ज्ञान प्रसार के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया.साहित्य एवं शिक्षा के ल‍िए उन्‍हें पद्म सम्‍मान द‍िया गया है.
*2. आर्मिडा फर्नांडीज:महाराष्ट्र*
‘स्नेहा’ संस्था की संस्थापक और निओनाटोलॉजी की दिग्गज डॉ. आर्मिडा ने झुग्गी-झोपड़ी की महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए 30 साल से अधिक काम किया है. उन्होंने मुंबई के सायन अस्पताल में देश का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक शुरू किया था. उन्‍हें हेल्‍थ में सम्‍मान‍ित क‍िया गया है.
*3. भगवान दास रायकवार: मध्‍य प्रदेश*
बुंदेलखंड के लोक नृत्य ‘राई’ को जीवित रखने वाले वरिष्ठ कलाकार. उन्होंने दशकों तक इस पारंपरिक नृत्य को सिखाया और देश भर में इसका प्रदर्शन किया. एक साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद, उन्होंने अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया. कला के ल‍िए सम्‍मान मिला.
*4. भिकल्या लडक्या ढिंडा: महाराष्ट्र*
आदिवासी वाद्य यंत्र ‘तारपा’ के उस्ताद. पालघर के इस आदिवासी कलाकार ने वारली संस्कृति की धड़कन माने जाने वाले तारपा को विलुप्त होने से बचाया है. वे नई पीढ़ी को भी इस वाद्य यंत्र को बनाने और बजाने की कला सिखा रहे हैं. कला के ल‍िए सम्‍मान‍ित क‍िए गए.
*5. बृज लाल भट्ट: जम्मू और कश्मीर*
धुमर और कश्मीरी लोक संगीत के संरक्षण के लिए अपना जीवन देने वाले कलाकार. आतंकवाद के दौर में भी उन्होंने संगीत का दामन नहीं छोड़ा और कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक विरासत को अपनी गायकी के जरिए संजोकर रखा है. कला के ल‍िए सम्‍मान मिला.
*6. बुदरी ताती: बस्‍तर छत्‍तीसगढ़*
बस्तर के आदिवासी अंचल की यह महिला ‘धोकरा कला’ (लौह शिल्प) और औषधीय ज्ञान के लिए जानी जाती हैं. नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रहकर भी उन्होंने आदिवासी परंपराओं को सहेजा और सैकड़ों महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा.समाज सेवा और कला के क्षेत्र में सम्‍मान.
*7. चरण हेम्ब्रम: ओड‍िशा*
संथाली भाषा के प्रसिद्ध लेखक और शिक्षाविद्. उन्होंने संथाली साहित्य को मुख्यधारा में लाने के लिए अथक प्रयास किए हैं. आदिवासी बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षित करने और पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में उनका बड़ा योगदान है. साहित्य एवं शिक्षा के ल‍िए पद्म सम्‍मान.
*8. चिरंजी लाल यादव: उत्तर प्रदेश*
बिरहा लोक गायन के पुरोधा. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकप्रिय बिरहा गायकी के माध्यम से उन्होंने सामाजिक मुद्दों को उठाया. उनका गायन ठेठ देहाती मिट्टी की खुशबू लिए हुए है जो लोक इतिहास को सुरक्षित रखता है. कला के ल‍िए सम्‍मान‍ित क‍िए गए.
*9. धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या: गुजरात*
गुजरात की लुप्त होती ‘भवाई’ लोक नाट्य परंपरा के 90 वर्षीय संरक्षक. उन्होंने 6 दशकों तक भवाई नाटकों के जरिए न केवल मनोरंजन किया बल्कि कुप्रथाओं के खिलाफ समाज को जागरूक भी किया. कला के ल‍िए सम्‍मान मिला.
*10. गफरुद्दीन मेवाती जोगी – कला (राजस्थान)
भपंग वाद्य यंत्र के जादूगर. अलवर के रहने वाले गफरुद्दीन ने मेवाती लोक संगीत की इस अनूठी विधा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई. ‘जोगी’ परंपरा के संवाहक, जो रामायण और महाभारत की कथाएं भपंग पर गाते हैं.
*11. हेली वार – कला (मेघालय) :
मेघालय के खासी संगीत की धुनों को जिंदा रखने वाले लोक संगीतकार. उन्होंने पारंपरिक खासी वाद्य यंत्रों के संरक्षण और निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे पूर्वोत्तर की यह प्राचीन संस्कृति लुप्त होने से बची हुई है.
*12. इंद्रजीत सिंह सिद्धू – समाज सेवा (पंजाब) :*
 पशु कल्याण और लावारिस जानवरों की सेवा में समर्पित व्यक्तित्व. उन्होंने पंजाब में बीमार और घायल पशुओं के लिए आश्रय स्थल बनाए और बिना किसी सरकारी मदद के वर्षों तक मूक प्राणियों की सेवा की.
*13. के. पजनीवेल– कला (पुडुचेरी/तमिलनाडु) :*
नादस्वरम के प्रख्यात वादक. दक्षिण भारतीय मंदिरों की परंपरा का अभिन्न अंग माने जाने वाले इस वाद्य यंत्र पर उनकी अद्भुत पकड़ है. उन्होंने इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखा है.
*14. कैलाश चंद्र पंत – साहित्य एवं शिक्षा (उत्तराखंड) :
कुमाऊंनी भाषा और साहित्य के विद्वान. उन्होंने उत्तराखंड की लोक कथाओं, मुहावरों और हिमालयी संस्कृति पर व्यापक शोध किया है. क्षेत्रीय भाषा को सम्मान दिलाने में उनका योगदान अतुलनीय है.
*15. खेम राज सुंद्रियाल – साहित्य/पत्रकारिता (उत्तराखंड/दिल्ली) :
पहाड़ के सरोकारों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने वाले वयोवृद्ध पत्रकार और लेखक. उन्होंने अपनी कलम से हिमालयी पर्यावरण और वहां के जनजीवन की कठिनाइयों को लगातार रेखांकित किया है.
*16. कोल्लाक्कायिल देवकी अम्मा  – समाज सेवा (पर्यावरण) (केरल) :
‘वन की मां’ के नाम से मशहूर. एक साधारण गृहिणी जिन्होंने अपने घर के पीछे 5 एकड़ जमीन को एक घने जंगल में बदल दिया. उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के हजारों पेड़ लगाए और जैव विविधता का एक अनूठा उदाहरण पेश किया.
*17. कुमारसामी थंगराज – विज्ञान एवं इंजीनियरिंग (तेलंगाना) :
प्रसिद्ध वैज्ञानिक जिन्होंने भारतीय जनसंख्या के जीनोमिक्स पर अभूतपूर्व शोध किया. उनके अध्ययन ने अंडमान की जनजातियों और भारतीय जाति व्यवस्था की आनुवंशिक जड़ों को समझने में मदद की. वे ‘जीनोम मैन’ माने जाते हैं.
*18. महेंद्र कुमार मिश्रा– साहित्य एवं शिक्षा (ओडिशा) :
लोकगीत और आदिवासी संस्कृति के शोधकर्ता. उन्होंने कालाहांडी और अन्य आदिवासी क्षेत्रों की मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया, जिससे वहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत दुनिया के सामने आ सकी.
*19. मीर हाजीभाई कासमभाई – कला (गुजरात) :
कच्छ की बन्नी कढ़ाई और पारंपरिक कला के संरक्षक. उन्होंने कच्छ के रेगिस्तान में छिपी इस हस्तकला को न केवल बचाया बल्कि सैकड़ों कारीगरों को रोजगार भी दिलाया. उनकी कला में गुजरात के रंगों की जीवंतता दिखती है.
*20. मोहन नगर – साहित्य एवं शिक्षा (हरियाणा/दिल्ली) :* शिक्षाविद और लेखक जिन्होंने वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए लंबा संघर्ष किया. उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाने और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
*21. नरेश चंद्र देव– समाज सेवा (त्रिपुरा) :
त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले, जिन्होंने अपना जीवन आदिवासी कल्याण और राज्य की स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया. (मरणोपरांत सम्मान).
*22. नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला  – समाज सेवा (गुजरात) :
सूरत के ‘अंगदान दूत’. उन्होंने ‘डोनेट लाइफ’ संस्था के जरिए हजारों लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित किया. उनके प्रयासों से कई मरते हुए मरीजों को नया जीवन मिला है. वे निस्वार्थ सेवा की मिसाल हैं.
*23. नूरुद्दीन अहमद – कला (असम) :* असम के मोबाइल थिएटर (भ्र्षाम्यमाण थिएटर) के दिग्गज स्टेज डिजाइनर और शिल्पकार. वे बांस और स्थानीय सामग्री से भव्य सेट बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं. 40 वर्षों से उन्होंने असमिया रंगमंच को दृश्य कला का नया आयाम दिया है.
*24. ओतुवर थिरुथानी स्वामीनाथन  – कला (तमिलनाडु) :
प्राचीन शैव मंदिरों में गाए जाने वाले ‘तेवारम’ भजनों के गायक (ओतुवर). उन्होंने भक्ति संगीत की इस लुप्त होती परंपरा को सहेजा है और चोल कालीन गायन शैली को अपनी आवाज में जीवित रखा है.
*25. पद्मा गुरमेट– कला (लद्दाख) :* लद्दाख की पारंपरिक पत्थर नक्काशी और मूर्तिकला के विशेषज्ञ. उन्होंने हिमालयी बौद्ध कला को संरक्षित किया है. कठोर मौसम और आधुनिकता की चकाचौंध के बीच वे अपनी छेनी-हथौड़े से पत्थरों में जान फूंक रहे हैं.
*26. पोखिला लेखतेपी – कला (असम) :
कार्बी आंगलोंग की लोक गायिका. उन्होंने कार्बी जनजाति के लोकगीतों और मौखिक इतिहास को अपनी गायकी के जरिए नई पीढ़ी को सौंपा है. वे पूर्वोत्तर की आदिवासी अस्मिता की एक सशक्त आवाज हैं.
*27. पुण्यमूर्ति नटेसन – कला (तमिलनाडु) :
थप्पट्टम या पराई अट्टम लोक नृत्य के गुरु. दलित समुदाय से जुड़े इस प्राचीन ढोल वादन और नृत्य को उन्होंने सम्मानजनक मंच दिलाया और इसे सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया.
*29. रघुपत सिंह – कृषि/समाज सेवा (राजस्थान) :
रेगिस्तानी इलाके में जल संरक्षण और जैविक खेती के लिए काम करने वाले किसान. उन्होंने पारंपरिक तरीकों से पानी बचाया और बंजर जमीन में खेती कर अन्य किसानों के लिए एक मॉडल पेश किया.
*30. रघुवीर तुकाराम खेड़कर – कला (महाराष्ट्र) :
तमाशा लोकनाट्य के दिग्गज कलाकार. कांताबाई सातारकर के परिवार से आने वाले रघुवीर ने तमाशा को अश्लीलता के आरोपों से बाहर निकालकर इसे एक सम्मानित लोककला के रूप में स्थापित करने में जीवन खपा दिया.
*31. राजस्थपति कालियाप्पा गाउंडर  – समाज सेवा (तमिलनाडु) :
ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले गांधीवादी विचारक. उन्होंने अपने गांव में स्कूल बनवाए और स्वच्छता अभियान चलाकर ग्रामीण जीवन स्तर को ऊपर उठाने में महती भूमिका निभाई.
*32. रामा रेड्डी मामिड़ी– साहित्य एवं शिक्षा (तेलंगाना) :
तेलुगु साहित्य और भाषा आंदोलन के प्रमुख स्तंभ. उन्होंने तेलंगाना की लोक संस्कृति और बोलियों पर व्यापक काम किया है. उनका लेखन स्थानीय अस्मिता और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करता है.
*33. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले– समाज सेवा (महाराष्ट्र):
डॉक्टर दंपति जिन्होंने अपना जीवन आदिवासी स्वास्थ्य के लिए समर्पित कर दिया. मेलघाट जैसे दुर्गम इलाकों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर कम करने के लिए उन्होंने ‘ट्रस्ट फॉर हेल्थ’ के जरिए वर्षों तक जमीनी काम किया.
*34. एस. जी. सुशीलाम्मा– समाज सेवा (कर्नाटक) :
‘सुमंडली सेवा आश्रम’ की संस्थापक. उन्होंने देवदासी प्रथा, बाल विवाह और घरेलू हिंसा की शिकार हजारों महिलाओं को आश्रय और रोजगार दिया. 80+ की उम्र में भी वे महिलाओं के सशक्तिकरण की मशाल थामे हुए हैं.
*35. संगयुसांग एस पोंगनर– कला (नागालैंड) :
नागालैंड के पारंपरिक ‘लॉग ड्रम’ और लोक संगीत के संरक्षक. उन्होंने एओ नागा जनजाति की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा है और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया है.
*36. शफी शौक – साहित्य एवं शिक्षा (जम्मू और कश्मीर) :* कश्मीरी भाषा के प्रख्यात विद्वान, कवि और आलोचक. उन्होंने कश्मीरी साहित्य को आधुनिक संदर्भ दिया और कई पुस्तकों का अनुवाद कर कश्मीरी संस्कृति को दुनिया से परिचित कराया. वे भाषा के सच्चे सेवक हैं.
*37. श्रीरंग देवबा लाड – कला (महाराष्ट्र) :* कोल्हापुर की कुश्ती और पारंपरिक कलाओं से जुड़े व्यक्तित्व. उन्होंने मिट्टी की कुश्ती को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोक कलाओं के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई. वे ग्रामीण खेल संस्कृति के ध्वजवाहक हैं.
*38. श्याम सुंदर – चिकित्सा/समाज सेवा (उत्तर प्रदेश) :* कालाजार रोग के उन्मूलन में अहम योगदान देने वाले बीएचयू के वैज्ञानिक/चिकित्सक. उन्होंने गरीबों की बीमारी कहे जाने वाले इस रोग की सस्ती दवा और इलाज खोजने में अपना जीवन लगा दिया.
*39. सिमांचल पात्रो– कला (ओडिशा) :
गंजाम जिले के लोक कलाकार, जो प्रह्लाद नाटक और मुखौटा नृत्य के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने लकड़ी और कागज की लुगदी से मुखौटे बनाने की कला को जीवित रखा है, जो ओडिशा की लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है.
*40. सुरेश हनागवाड़ी – चिकित्सा (कर्नाटक) :*
हीमोफीलिया के मरीजों के मसीहा. दावणगेरे के इस डॉक्टर ने खुद इस बीमारी से जूझते हुए ‘कर्नाटक हीमोफीलिया सोसाइटी’ बनाई और हजारों गरीब मरीजों को महंगा इलाज और देखभाल मुफ्त या रियायती दर पर उपलब्ध कराई.
*41. तगा राम भील – कला (राजस्थान) :
जैसलमेर के मांगणियार/भील परंपरा के लोक गायक. उनका गायन रेगिस्तान की आत्मा है. उन्होंने अपनी खनकती आवाज से राजस्थानी लोकगीतों को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया, फिर भी वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे.
*42. टेची गुबिन – समाज सेवा (अरुणाचल प्रदेश) :
अरुणाचल में नशामुक्ति और सामाजिक सुधार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता. उन्होंने युवाओं को नशे के चंगुल से निकालने और उन्हें खेलों व रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ने के लिए कई अभियान चलाए हैं.
*43. तिरुवरुर भक्तवत्सलम – कला (तमिलनाडु) :
मृदंगम के दिग्गज वादक. 60 वर्षों से अधिक की संगीत साधना. उन्होंने मृदंगम वादन की तंजावुर शैली को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और सैकड़ों शिष्यों को तैयार कर शास्त्रीय संगीत की सेवा की.
*44. विश्व बंधु– समाज सेवा (उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड) :
सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और स्वच्छता के लिए काम करने वाले गांधीवादी. उन्होंने मैला ढोने की कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और स्वच्छता कर्मियों के पुनर्वास और सम्मान के लिए लंबा संघर्ष किया.
*45. युमनाम जात्रा सिंह– कला (मणिपुर) :
मणिपुरी ‘नट संकीर्तन’ और रासलीला के गुरु. अशांति के दौर में भी उन्होंने मणिपुर की इस आध्यात्मिक नृत्य परंपरा को नहीं टूटने दिया. वे इंफाल में कला के माध्यम से शांति और भक्ति का संदेश फैला रहे हैं.
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।
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