लखनऊ/उत्तर प्रदेश: राजधानी लखनऊ समेत पूरे प्रदेश में निजी स्कूलों की मनमानी फीस, कॉपी-किताब और स्टेशनरी वसूली को लेकर मचे बवाल के बीच जिला प्रशासन की भूमिका अब सवालों के घेरे में आ गई है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई जगहों पर जिला अधिकारी सिर्फ घोषणाएं करते नजर आ रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कार्रवाई शून्य बनी हुई है।
जिला अधिकारी (लखनऊ) सहित अन्य जिलों के अधिकारियों द्वारा बार-बार कमेटी गठन और जांच के दावे किए गए, लेकिन अब ये दावे सोशल मीडिया पर मज़ाक का विषय बनते जा रहे हैं। आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि जिला अधिकारियों के वश की बात नहीं है कि वे बड़े और प्रभावशाली स्कूलों पर कोई ठोस कार्रवाई कर सकें।
सूत्रों के अनुसार, करीब 80 से 90 प्रतिशत अभिभावकों से पहले ही फीस, किताबें और अन्य शुल्क के नाम पर पूरी वसूली की जा चुकी है। ऐसे में अब जांच और कमेटी गठन की बातें सिर्फ “खानापूर्ति” जैसी प्रतीत हो रही हैं। जिन अभिभावकों को लूटा जाना था, वे लुट चुके—अब कार्रवाई की बातें केवल कागजों और बयानों तक सीमित दिख रही हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Facebook और WhatsApp पर वायरल हो रही पोस्ट्स में जिला अधिकारियों को “घोषणाओं का अधिकारी” और “हास्य का पात्र” तक कहा जा रहा है। यूज़र्स लिख रहे हैं कि हर साल की तरह इस बार भी केवल बयानबाज़ी हो रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई में कोई बदलाव नहीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर कभी कार्रवाई होती भी है, तो वह छोटे और कम प्रभाव वाले स्कूलों तक सीमित रह जाती है, जबकि बड़े और प्रभावशाली संस्थानों पर प्रशासन हाथ डालने से बचता है। इससे यह संदेश जा रहा है कि नियम केवल कमजोरों के लिए हैं, ताकतवरों के लिए नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जिला प्रशासन वास्तव में कार्रवाई करने की स्थिति में है, या फिर यह पूरा मामला हर साल की तरह बयान, कमेटी और कागजी कार्यवाही तक ही सीमित रह जाएगा?
फिलहाल स्थिति यही दर्शाती है कि अभिभावकों की जेब खाली होने के बाद भी प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार जारी है—और जिला अधिकारी केवल आश्वासन देने तक सीमित नजर आ रहे हैं।







