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भारतीय सिनेमा की सबसे बोल्ड और पसंदीदा सिंगर्स में से एक आशा भोसले का रविवार को मुंबई में 92 साल की उम्र में निधन

मुंबई। आशा भोसले के निधन के बाद उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर का ज़िक्र स्वाभाविक है। बता दें कि लता मंगेशकर का निधन फरवरी 2022 में हुआ था और उनकी उम्र 92 साल थी। ठीक इसी तरह, निधन के वक्त आशा भोसले की भी उम्र 92 साल ही थी। दोनों बहनों के निधन में ये बहुत बड़ा सहयोग माना जा रहा है। भारतीय सिनेमा की सबसे बोल्ड और पसंदीदा सिंगर्स में से एक आशा भोसले का रविवार को मुंबई में 92 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके परिवार ने पुष्टि की कि उन्होंने कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली, जिससे सात दशक से अधिक समय तक उनका करियर समाप्त हो गया। लाखों लोगों के लिए आशा भोसले सिर्फ एक गाय से कहीं ज्यादा थीं। एक ऐसी आवाज थी जो उनके साथ पली-बढ़ी थी, जो कई सदियों तक याद रखने का आग्रह करती थी। लता मंगेशकर की बड़ी बहन थीं, परिवार का निधन 2022 में हुआ था।

लेकिन आप दोनों देशों की बोलियों के निधन से लेकर एक संयोग तक क्या जानते हैं, लता मंगेशकर से थी ये बात अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ मिलकर उन्होंने अपनी आवाज से भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। फिर भी, एक समय ऐसा भी था जब युवा आशा को डर था कि वह हमेशा अपनी बड़ी बहन की छाया में ही रहती थी। आशा अक्सर लता मंगेशकर के साथ काम करती थीं। इन रिकॉर्डिंग के दौरान एक तरह का दबाव भी रहता था। आशा भोसले ने 12,000 से अधिक गाने लिखे, उनकी यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। सात दशक से भी अधिक समय में, आशा भोंसले ने 12,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम रिकॉर्ड किया।

*लता मंगेशकर और आशा भोसले की उम्र में अंतर*
उम्र के अंतर की बात करें तो लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर, 1929 को हुआ था, जबकि आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर, 1933 को हुआ था। ऐसे दोनों बहनों की उम्र में चार साल का अंतर था। और लता के निधन के ठीक 4 साल बाद आशा ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।

*आशा भोसले के गाने*
‘आजा आजा’ और ‘ओ मेरे सोना रे’ से लेकर फेमस गाना ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘ये मेरा दिल’ से लेकर ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ तक, आशा भोसले ने हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे यादगार गाने दिए हैं।

*आशा भोसले को पुरस्कार*
उन्हें 2008 में पद्म विभूषण और 2001 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने पहला फिल्मफेयर पुरस्कार ‘गरीबों की सुनो’ (दस लाख, 1967) और ‘परदेस में रहने दो’ (शिकार, 1969) के लिए जीता। उन्होंने ‘उमराव जान’ और ‘इजाज़त’ जैसी फिल्मों में अपने काम के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता।

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